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दामोदरी

Posted On: 3 Dec, 2013 Others,मेट्रो लाइफ में

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मुंबई में अंधेरी स्थित एक बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी में मुझे प्रोडक्षन ऑफीसर की नौकरी मिल गयी | पच्चीस वर्षीय मोहनलाल सक्सेना के लिए यह जीवन का स्वर्णिम दिन था | वाराणसी के पास एक कस्बे-नुमा गाओं से सपनों के शहर बंबई चला तो मेरे साथ था मेरा आशीर्वाद और मेरी एक डिग्री |

सुना था यहाँ कामयाब होने  के लिए लोगों को फुटपाथ पर सोना पड़ता है या स्टेशन पर | पर ईश्वर की कृपा से एक हफ्ते के अंदर मेरे हाथ में अप्पोइन्तमेंट लेटर था और पूना स्थित कंपनी के प्लांट में रिपोर्ट करना था | पूना के बारे में सिर्फ़ इतनी जानकारी थी की वहाँ फिल्म इन्स्टिट्यूट है, जिसके प्रॉडक्ट शबाना आज़मी और नसीरूद्दीन शाह हैं | उन दिनों बंबई शांत और कोलाहल-रहित थी | पूना के रास्ते का रमणीय नज़ारा मनमोहक, आकर्षक लगा | महसूस किया कि अगर बादशाह अकबर कश्मीर जाने से पहले कभी पूना आता तो इस वादी  को ही स्वर्ग कहता |

पूना से पिंपरी प्लांट में ज्वॉइन करते ही कंपनी की ओर से फ्लॅट भी मिल गया | कुछ दिनों बाद शादी शादी भी हो गयी |यहाँ के लोगों की सज्जनता, व्यवहार और प्रेम ने हमें पुनावासी बना दिया | नौकरी, म्कान, धन-दौलत, परिवार; सब कुछ एक को संतुष्ट करने के लिए काफ़ी था | ऐसे ही जीवन की भाग-दौड़ में उम्र पच्चीस से पचपन की हो गयी | कभी-कभी रात के अंधेरे में अतीत मेरी नाज़ुक उंगलियाँ पकड़ मेरे कॉलेज के चौराहे पर छोड़ जाता |

वाराणसी से पाँच किलोमीटर दूर नाथपूर, एक छोटा सा कस्बा था | ऐतिहासिक जगह होने की वजह से पर्यटकों का ताँता लगा रहता | मेरे कॉलेज की चौमुहानी पर चाय-पान की गुमटी लोगों का अड्डा थी | एक सीनियर लोगों का दल था जिसमें टीस से उपर के लोग थे जो शहर के आस-पास नौकरी करते और शाम को चौराहे पर चाय पानी के अलावा दामोदरी सेवन करते | दामोदरी वहाँ के मदीरा का उप-नाम था |

पास के दामोदर-गंज गाओं में बिना रोक-टोक बनाई जाती और वहाँ के दबंग ठाकुर जगदीश सिंह की देखरेख में रातों-रात यह सब जगह पहुँच जाती | दामोदर-गंज से चलते -चलते इसकी बोतलें दामोदरी बन लोगों को आगोश में लेकर मदहोश करती | इस टीम में दीपक, सुधीर, प्यारेलाल, हसन वग़ैरह थे | इनमें सिर्फ़ एक, प्यारेलाल, फुटबाल खिलाड़ी जो सरकारी अधिकारी थे, दामोदरी के चंगुल से दूर थे | जूनियर टीम में पंद्रह से बीस साल के नौजवान कॉलेजों में पढ़ाई करते थे | तपन, श्याम, प्रकाशलाल और जगत यादव मेरे निकट मित्रों में थे | ये लोग सेनीयर टीम के पास इसलिए मंडराते रहते कि शायद बची-खुचि दामोदरी इन्हें मिल जाए |

उन दिनों ब्राह्मण, ठाकुर और यादवों के लड़कों की शादी पंद्रह-सोलह की उम्र में हो जाती और बीस लगते-लगते गौना हो जाता, इसलिए सभी दोस्त बीवी वाले हो चुके थे | मैं, लाला खानदान का छियाग, अपने पैर पर खड़े होने से पहले, घोड़ी चढ़ने के सपने कैसे देखता? उम्र में छोटी होने के बावजूद सबकी बीवियाँ मेरी भाभी थी | इसमें जगत की बीवी रजनी बड़ी ही सुशील और खुश-मिज़ाज थी | जब भी मैं भाभी पुकारता, तुरंत मुझे मज़किया अंदाज़ में जेठ जी संबोधित करती | इस बात पर अक्सर हमारी नौंक-झोंक होती | पर एक बात है; वो खाना बड़ा लज़ीज़ बनाती और अधिकार से खिलाती |

मेरे पूना नौकरी के बाद अन्य भाई भी अलग-अलग शहरों में चले गये और नाथपुरा से संपर्क लगभग टूट गया | रह गयी सिर्फ़ मधुर यादें |

जीवन के इस मोड़ पर बिछड़े साथियों से मिलने का अब मैने पक्का इरादा  कर लिया | जल्द ही एक समारोह में वाराणसी जाने का मौका मिला, समारोह से निपटने के बाद मैं नाथपुरा की ओर चल पड़ा | मान में जोश था की पचपन वर्षीय मोहनलाल को देख कर तपन, श्याम, जगत सभी उछाल पड़ेंगे | उम्र के लिहाज़ से अब मैं रजनी का सचमुच में जेठ बन गया था |

नाथपुरा में अस्सी वर्षीय प्यारेलाल जी से मुलाकात हुई | यहाँ मैं खुशखाबरों की तलाश में इतनी दूर आ गया और वहाँ प्यारेलाल जी से जो सुना वो पूरी तरह अविश्वसनिया और स्तब्ध करने वाला था |

“सभी सीनियर टीम के लोगों में कोई नहीं बचा सिवाय मेरे | दुख की बात तो यह है कि तुम्हारे बचपन के सभी साथी – तपन, श्याम, जगत और प्रकाश को भी दामोदरी निगल गयी | आश्चर्य की बात यह है कि सारे मूह या लिवर के कॅन्सर से काल-कवलित हुए |”

मेरे पूरे शरीर को जैसे भूचाल ने झकझोर दिया | मानो कान फट जाएँगे | उसमें भाभियों का लीप, कुंदन और टूटती चूड़ियों की कसक भर गयी | प्यारेलाल ने ईश्वर का धन्यवाद दिया, जिसने हम दोनों को दामोदरी से बचाया | जगत के घर जाने की हिम्मत तो जवाब दे चुकी थी फिर भी भारी कदमों से उसके घर चल पड़ा | जगत के घर रजनी के सामने मैं स्तब्ध खड़ा था, मानो ज़ुबान तालू से चिपक गयी हो | सामने रजनी थी, एकदम निस्तेज, निर्जीव, आँखों में एक प्रश्न लिए | थोड़ी देर अपने आप को रोकने की नाकाम कोशिश करती रही | आख़िरकार दहाड़ मारकर मेरे कदमों में गिर पड़ी | ये कैसी विडंबना थी कि रिती रिवाजों में जकड़ा मोहन जेठ से मोहन भाई बना और उसके आँखों से आँसू भी नहीं पोंछ सका | रजत के दोनों बेटों को गले लगा कर आंसूओं के सैलाब को बह जाने दिया | सामान्या होने के बाद रजनी ने एक सवाल किया, ” मोहन भाई, आप तो जगत के ख़ास दोस्त थे, खुद बचे रहे, उन्हें दामोदरी के चंगुल से बचने की सलाह क्यों नहीं दी?”

मैं क्या जवाब देता, सिर्फ़ इतना कहा, ” मैंने बहुत कोशिश कि सबको बचाने की | हर बार उस भीड़ में अल्पमत में रह जाता | दामोदरी और दोस्ती की जंग में दामोदरी जीत गयी, दोस्ती हार गयी |”

वापसी में जब नाथपुरा चौमुहानी पर आया तो वहाँ पर कुछ नौजवान और बच्चे अभी भी दामोदरी के  नशे में  लड़खड़ाते मिले | फ़र्क इतना था की ग्राहक और सप्लायर बदल गये थे |

मैं आज भी अल्पमत में था |

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
December 4, 2013

बहुत भावुक कहानी, साथ मे एक बहुत ज़रूरी सार्थक संदेश दने के ,लिए आपका धन्यवाद..

yatindranathchaturvedi के द्वारा
December 5, 2013

शुभकामनाएं, सादर।

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 5, 2013

आपके एक एक शब्द में सच्चाई है काश इसे लोग समझ जाते . बहुत खूब

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 5, 2013

आपका एक एक शब्द हक़ीक़त से भरपूर है काश ये लोगों के समझ में आ जाए .

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 5, 2013

आपके एक एक शब्द हक़ीक़त से भरपूर है काश इसे लोग समझ पाते .

Shakil Siddiqui के द्वारा
December 14, 2013

lekhak ke liye ye sabse bada puraskar hota hai agr uski rachana pathak ke marm ko choo le. Aap ke vicar hameri prerna hogi. Hamari anya kahaniyon per aap ke sujav mera utsah varden karenge. Dhanyawad Shakil Siddiqui


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